मूवीज

हॉलीवुड में जड़ें जमाता मूल इंडिया

161views


भिनेता लियाम नीसन की फिल्म ‘दि आइस रोड’ (2021) के शुरूआती पल कुछ अलग तरह से ध्यान खींचते हैं. स्टीवन स्पीलबर्ग की ‘शिंडलर्स लिस्ट’ (1993) के समय से ही नीसन को यहां भी खासा पसंद किया जाता रहा है. बेशक, बहुत से दर्शक उनके नाम से कम वाकिफ हों, पर शक्ल से जान जाते हैं कि ‘टेकन’ (2008) वाला बंदा यही है. इस फिल्म में ध्यानाकर्षण की एकमात्र वजह नीसन नहीं हैं. फिल्म की शुरूआत के 30वें सेकेंड में हंस की आकृति के साथ शिव और हंस का नाम, किसी भी भारतीय सिने प्रेमी का ध्यान खींचने के लिए काफी है.

क्या ये कोई भारतीय फिल्म कंपनी है या इसका निर्माता कोई…? जवाब अगले कुछ मिनटों में स्क्रीन पर उभरकर आया- प्रोड्यूस बाय, शिवानी रावत. पता लगता कि छह वर्ष पहले कुछ अमेरिकी मीडिया द्वारा शिवानी की तुलना ‘अन्नपूर्णा पिक्चर्स’ की संस्थापक, निर्माता मेगन एलिसन से की जाने लगी थी. कैलिफॉर्निया में जन्मीं मेगन (35 वर्षीय) ने एक निर्माता के रूप में काफी कम समय में ‘जीरो डार्क थर्टी’ (2012), ‘हर’ (2013) और ‘अमेरिकन हसल’ (2013) आदि जैसी फिल्मों से खासी ख्याति अर्जित की है.

उनके पिता लैरी एलिसन, एक प्रसिद्ध बिजनमैस और निवेशक हैं तथा ऑरेकल कॉर्प. के सह-संस्थापक, कार्यकारी अध्यक्ष और सीटीओ भी हैं. ये जानना दिलचस्प होगा कि मेगन एक अमेरिकी हैं और उनकी कंपनी का नाम अन्नपूर्णा पिक्चर्स कैसे पड़ा? इस पर थोड़ी देर में आएंगे. पहले ये देखें कि इस तुलना के कोई मायने हैं भी कि नहीं?

बढ़ रहा है दबदबा
हालांकि एक आम सिने दर्शक, बाहर (हॉलीवुड या कोई विदेशी फिल्म) की किसी फिल्म में भारतीय कलाकार की मात्र एक झलक से ही गद्गद हो उठता है. लेकिन हॉलीवुड के एक नामी सितारे की फिल्म में बतौर निर्माता किसी भारतीय नाम इस तरह से दिखाई पड़ना, एक झलक पाने वाले उस अहसास से काफी अलग-सा लगता है. बीते साल आयी एरन सॉर्किन निर्देशित अमेरिकी फिल्न ‘दि ट्रायल ऑफ दि शिकागो 7’, भी कुछ ऐसा ही अहसास कराती है, जब नजर जाती है इससे जुड़ी निर्माण कंपनियों की लिस्ट पर.

‘दि ट्रायल ऑफ दि शिकागो 7’ फिल्म को 93वें अकेडमी अवॉर्ड्स (ऑस्कर पुरस्कार) में बेस्ट पिक्चर, सर्वश्रेष्ठ सह-कलाकार और सर्वश्रेष्ठ पटकथा सहित छह अलग-अलग श्रेणियों में नामांकित किया गया था. ड्रीमवर्क्स, पैरामाउंट और क्रॉसक्रीक पिक्चर्स आदि जैसी प्रतिष्ठित प्रोडक्शन कंपनियों के साथ इनमें एक नाम शिवानी रावत की शिवहंस पिक्चर्स का भी जुड़ा था, जो साल 2015 में ‘ट्रुम्बो’ और ‘डैनी कॉलिन्स’ जैसी ऑस्कर नामित फिल्मों के समय से सुर्खियों में थीं.

वैसे, बता दें कि स्टीवन स्पीलबर्ग (संस्थापक) की ड्रीमवर्क्स पिक्चर्स में भारतीय मीडिया कंपनी रिलायंस एंटरटेन्मेंट के साथ साल 2009 में फिल्मों के निर्माण आदि को लेकर गठजोड़ हुआ था. साल 2012 में 84वें अकेडमी अवॉर्ड्स के दौरान रिलायंस ड्रीमवर्क्स द्वारा निर्मित ‘दि हेल्प’ और ‘वॉर हॉर्सेज’ (स्पीलबर्ग द्वारा निर्देशित) जैसी चर्चित फिल्मों को बेस्ट फिल्म कैटेगरी सहित अलग-अलग श्रेणियों में 9 नॉमिनेशन मिले थे.

यह अपने आप में वाकई गर्व का मौका था, क्योंकि पहली बार भारतीय स्वामित्व वाली किसी फिल्म कंपनी की फिल्मों को इतनी श्रेणियों में ऑस्कर के लिए नामित किया गया था. कई सफल फिल्मों के निर्माण के साथ साझेदारी का यह सिलसिला चलता रहा. फिर साल 2019 में 91वें एकेडमी अवॉर्ड्स में रिलायंस एंटरटेन्मेंट, स्टीवन स्पीलबर्ग (संयुक्त उद्यम) और पार्टिसिपेंट मीडिया ने मिलकर फिल्म ‘ग्रीन बुक’ और ‘फर्स्ट मैन’ के जरिये 4 ऑस्कर पुरस्कार अपने नाम किये.

हां, ये कहा जा सकता है कि एक भारतीय मीडिया कंपनी है, जो बीते एक दशक से हॉलीवुड के नामचीन एवं प्रतिष्ठित व्यक्ति तथा उनके बैनर के साथ जुड़कर फिल्मों के निर्माण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर रही है. लेकिन ऐसा कम ही देखने में आता है कि एक ही फिल्म के निर्माण में दो ऐसी कंपनियां दिखाई पड़ें, जिनका नाता अपने देश की मिट्टी से है.

कुछ नाम ऐसे भी हैं, जिन्होंने बाहर की फिल्मों में अभिनय से इतर लेखन, निर्देशन और निर्माण में अपना हुनर दिखाया है. बतौर लेखक दीया मिश्रा की उपलब्धि भी सराहनीय कही जा सकती है. युवा दीया ने नेटफ्लिक्स की ताजा रिलीज एनिमेशन सिरीज ‘मास्टर्स ऑफ दि यूनिवर्सः रैवलेशन’ (2021) के एपिसोड 2 को अपनी लेखनी से संवारा है. नब्बे के दशक में दूरदर्शन के जमाने में ही-मैन कार्टून सिरीज का अपना एक क्रेज हुआ करता था.

कई चरणों में बदलावों के दौर से होकर गुजरा रैवलेशन, रचनाकार केविन स्मिथ के नेतृत्व एक नए रूप और विचार के साथ लाया गया है. इसी तरह कहानी-पटकथा लेखन के ही क्षेत्र में सिमरन बैदवान का नाम भी आसानी से ओझल नहीं होता. प्रसिद्ध अमेरिकी टेलिविजन ड्रामा ‘दि गुड डॉक्टर’ के विभिन्न सीजन्स में सिमरन का नाम कई बार टाइटल्स में एक लेखक के रूप में फ्लैश होता है और बाद में इसी शो के सह-कायर्कारी निर्माता के रूप में तब्दील हो जाता है.

लेकिन, एक निर्माता के रूप में आलोक मिश्रा, हॉलीवुड और सिनेमा शिल्प को कुछ अलग तरह से देखने का प्रयास कर रहे हैं, जिनकी अमेरिकी हॉरर फिल्म 1बीआर (2019) ने खासी चर्चा बटोरी है. इसी तरह देखें तो निर्देशक एवं पटकथा लेखक शरत राजू, वैलरी कौर (राजू की पत्नी), निर्देशक वीना सूद, निर्माता-निर्देशक मंजरी मकिजानी, अभिनेता दिलीप राव, अभिनेता राहुल कोहली आदि कई नाम हैं, जो आकर्षिक करते हैं.

नाताः यहां से वहां तक
यहां भारतीय से तात्पर्य भारतीय मूल, भारतीय नाम वाले, भारत से संबंध रखने वाले, प्रवासी भारतीय, भारत में जन्में, लेकिन विदेश में पले-बढ़े या विदेश में जन्मे भारतीयों से है. मसलन, भारतीय मूल की शिवानी रावत का जन्म अमेरिका के न्यू जर्सी में हुआ लेकिन उनकी स्कूली शिक्षा देहरादून, उत्तराखंड के वैल्हम गर्ल्स स्कूल से हुई और बाद में उन्होंने न्यू यार्क के दि न्यू स्कूल से ग्रेजुऐशन और फिर न्यू यार्क फिल्म एकेडमी से शिक्षा ग्रहण की. शिवानी रावत, डिवाइन लाइट मिशन के संस्थापक धर्म गुरु हंस महाराज की पोती हैं और उनके पिता महिपाल रावत एक निवेशक हैं.

दरअसल, हाल के कुछ वर्षों में कुछ ऐसे प्रयास हुए हैं जिससे भारतीय पृष्ठभूमि के फिल्मकार कुछ ज्यादा अलग ढंग से उभरकर सामने आये हैं. कुछ साल पहले शिवानी और मेगन की तुलना इसलिए भी हो रही थी, क्योंकि मेगन की तरह ही शिवानी भी इंडिपेंडेंट फिल्मकारों के लिए आशा की किरण थीं. फिल्म ‘मुंबई होटल’ (2018) की रिलीज इसका उदाहरण है. मेगन ने खास अंदाज वाले प्रतिभाशाली निर्देशकों पर अपना फोकस किया, तो शिवानी का लक्ष्य मीडियम बजट वाली गुणवत्तापूर्ण फिल्मों पर केन्द्रित था, जिनकी कहानियां मानवीय पहलुओं पर आधारित हों.

बड़े स्टूडियोज के फ्रेम में जो चीजें फिट नहीं होती थीं, उनके लिए शिवानी ने हाथ आगे बढ़ाए. हॉलीवुड में उनकी फिल्म कंपनी का नाम लोगों का ध्यान खींचता है, क्योंकि उसका अर्थ भारतीय संस्कृति में छिपा है. तो दूसरी तरफ मेगन की कंपनी का नाम हिमालय पर्वत श्रंखला अन्नपूर्णा पर्वत (नेपाल में स्थित) के नाम पर है, जो जिज्ञासा पैदा करता है. ऐसे ही शरत राजू का जन्म शिकागो में हुआ और पढ़ाई भी अमेरिका में ही हुई.

शरत राजू के दादा गोपालकृष्ण अडिग, साहित्य अकादमी पुरस्कार (1974) से सम्मानित कन्नड़ भाषा के विख्यात साहित्यकार थे. शरत की पत्नी वैलरी कौर जो कि एक फिल्मकार होने के साथ-साथ सामाजिक कार्यकर्ता और वकील भी हैं, किसानी करने वाले के एक सिख परिवार से हैं, जो सन 1913 में क्लोविस, कैलिफोर्निया आकर बस गया था. लेकिन, शरत और कौर की पहचान यहीं तक सीमित नहीं है.

आप ऐसे भी समझ सकते हैं कि ये लोग अमेरिकी अभिनेता कॅल पेन (भारतीय गुजराती प्रवासी परिवार से है) या अभिनेत्री सकीना जाफरी (मधुर एवं सईद जाफरी की बेटी) की तरह हैं, जो भारत में तो नहीं जन्मे लेकिन उनके माता-पिता का संबंध यहीं से है और जब-जब इन नामों के साथ सिनेमा की बात होती है, तो भारत का जिक्र या देसी मिट्टी की खुशबू का अहसास होना लाजिमी है.

वीना सूद टोरेंटो, कनाडा में पैदा हुईं और उनके पिता मोहिंदर सूद जो कि एक चिकित्सक हैं, का जन्म भारत में हुआ था. टेलि सिरीज में बतौर एक्ट्रेस, निर्देशक और लेखक के रूप में वीना ने अपना करियर शुरू (1996 में) करने के बाद साल 2001 में ‘दि रीयल वर्ल्ड’, ‘सोरोसटी लाइफ’ (2002), ‘कोल्ड केस’ (2003-08) और ‘दि किलिंग’ (2011-14) की सफलता ने उन्हें बुलंदियों पर पहुंचा दिया. बाद में ‘दि साल्टन सी’ (2016) और ‘दि लाई’ (2018) जैसी फिल्मों से उन्हें और सुर्खियां मिलने लगीं.

लेकिन, साल 2018 में आयी अमेरिकी क्राइम ड्रामा सिरीज ‘सेवन सेकेंड्स’ ने उन्हें मुख्यधारा के फिल्मकारों से कुछ अलग करने का मौका दिया. यह सिरीज ब्लैक लाइव्ज मैटर, नामक सामाजिक मुहीम से प्रेरित थी. एक रचनाकार, लेखक और निर्माता के रूप में इस सिरीज की सफलता का श्रेय वीना सूद के नाम रहा, जो कई मायनों में उन फिल्मकारों के लिए प्रेरणादायी अनुभव भी है, जो इस विषय पर एक समान राय रखते हैं.

यूं बढ़ती है भारत की चमक
ऊपर हमने शरत राजू और उनकी पत्नी वैलरी कौर के बारे में बात की. शरत, एक लेखक-निर्देशक हैं और टेलिविजन सरीज के साथ-साथ अमेरिका आने वाले आप्रवासियों पर फिल्में भी बनाते हैं, जिनमें उनकी जटिलताओं और मानवीय पहलुओं का चित्रण होता है. वीना सूद की तरह ही उनके नाम भी- ‘हाउ टू गैट अवे विद मर्डर’, ‘लॉ एंड ऑर्डर’, ‘स्पेशल विक्टिम यूनिट’ और ‘वंस अपॉन ए टाइम’ जैसी कई सफल अमेरिकी टीवी सिरीज हैं. उनके काम को बेहद शुरूआती दौर में ही पहचाना जाने लगा था, जब उन्होंने अमेरिकन फिल्म इंस्टीयूट में पढ़ाई के दौरान तीन शार्ट फिल्में और डाक्यूमेंट्रीज बनाई थीं.

शरत राजू की पहली फिल्म ‘अमेरिकन मेड’ में कल पेन और सकीना जाफरी ने अभिनय किया था, जिसे 17 फिल्म समारोह में दिखाया गया. रचनात्मक तौर पर वह अपनी वैलरी कौर के साथ जुड़कर कुछ अलग प्रकार के सिनेमा का प्रदर्शन करते दिखते हैं. वैलरी कौर, ने साल 2006 में ‘डिवाइडिड वी फॉलः अमेरिकंस इन दि ऐफ्टर्मैथ’, नामक 32 मिनट की फिल्म बनाई जो कि 9/11 की घटना के बाद अमेरिका में सिखों और मुस्लिमों के प्रति पैदा हुई नफरत और हिंसा का चित्रण करती है.

सन 1949 में पंजाब, भारत में जन्मे बलबीर सिंह सोंढी उस नफरती हिंसा में मारे गये (15 सितंबर, 2001) पहले सिख थे और कौर के पारिवारिक संबंधी भी. इसके बाद कौर और राजू ने पुलिस प्रशासनिक नीतियों पर ‘स्टिगमा’ (2011), अप्रावासियों पर होने वाली रेड पर ‘एल्यनेशन’ (2011) और ‘अॅक क्रीकः इन मैमोरियम’ (2012) जैसी कई फिल्में बनाई, जिनमें न केवल अप्रावासी भारतीयों बल्कि दुनियाभर से अमेरिका में आने वाले आप्रावासियों, तथा विभिन्न धर्मों और समाजों के खिलाफ होने वाली अलग-अलग प्रकार की हिंसा का चित्रण दिखता है.

वैलरी कौर और राजू भले ही जन्म से भारतीय नहीं हैं. लेकिन जब वर्ल्ड इकॉनामिक फोरम द्वारा कौर को यंग ग्लोबल लीडर (2015) से सम्मानित किया गया या इंडिया अब्रॉड द्वारा पर्सन आफॅ दि ईयर (2013) सम्मान से नवाजा गया, तो भारत की चमक अपने आप ही बढ़ जाती है.

क्या बदलेगा एशियाई नजरियावैसे, देखा यही जाता रहा है कि हॉलीवुड हो या बाहर की कोई अंग्रेजी फिल्म, चंद सेकेंड्स का रोल पाकर भी कोई भारतीय कलाकार खुद को धन्य सा मानने लगता है. कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो वास्तविकता यही है कि भारतीय एक्टर्स को एशियाई मूल के ठप्पे के साथ ही बाहर की फिल्मों में काम मिलता रहा है. हालांकि इसमें कोई बुराई नहीं है, लेकिन क्या वजह है कि वहां के फिल्मकार इससे हटकर कुछ सोच नहीं पाते और क्या हमेशा ऐसा ही होता रहेगा?

बॉन्ड सिरीज की ‘ऑक्टोपसी’ (1983) में गोबिंद (कबीर बेदी) हो या हैरिसन फोर्ड अभिनीत ‘इंडियाना जोंस एंड दि टैम्पल ऑफ डूम’ (1984) का मोला राम (ओम पुरी). ‘दि सेकेंड जंगल बुकः मोगली एंड बालू’ (1997) का बलदेओ (गुलशन ग्रोवर) हो या ‘दि पिंक पैंथर 2’ की सोनिया (ऐश्वर्या राय). ‘मिशन इम्पॉसिबलः घोस्ट प्रोटोकॉल’ (2011) में अनिल कपूर द्वारा निभाया गया मीडिया टायकून ब्रिजनाथ का किरदार और क्रिस्टोफर नोलन की ‘टेनेट’ (2020) में आधुनिक हथियारों की अवैध डीलर प्रिया सिंह के रोल में डिंपल कपाड़िया, दोनों में काफी समानता है.

हॉलीवुड या कई अन्य फिल्मों में बहुत अच्छे किरदार निभाने के बावजूद नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी और इरफान खान जैसे धुरंधर कलाकारों की प्रतिभा को भी इसी नजरिये से देखा जाता रहा. कलाकारों का रोल या तो बहुत छोटा रहा है या थोड़ा-सा लंबा. और क्या इस पर किसी का ध्यान जाता होगा कि रोल महत्वपूर्ण है या नहीं? इससे इतर सारा जोर इस बात पर दिखता है कि पोस्टर पर फोटो है या नहीं. है तो कितनी छोटी या बड़ी है. या ट्रेलर में झलक है या नहीं. अगर है तो कितने सेकेंड्स के लिए है.

वैसे, एशियाई मूल का दंश केवल भारतीय कलाकारों को ही नहीं बल्कि वहां के कलाकारों को भी कई बार भुगतना पड़ जाता है. लॉस एंजेलिस में जन्मे दिलीप राव (48 वर्षीय) की मां चिकित्सक हैं और पिता इंजीनियर, दोनों भारतीय हैं. साल 2009 में सैम रैमी की हॉरर फिल्म ‘ड्रैग मी टू हेल’, से उन्होंने फिल्मों में कदम रखा, जिसमें उन्होंने रामजस नामक एक छदम तांत्रिक का रोल निभाया था, जो तंत्र-मंत्र और छाड़-फूंक से भूतों को भगाने का दावा करता है. ये रोल उन्होंने रास आया और बाद में उन्होंने ऐसे ही रोल कई बार निभाए.

जेम्स कैमरून की ‘अवतार’ (2009) में डॉ. मैक्स पटेल, क्रिस्टोफर नोलन ‘इंसेप्शन’ (2010) में युसुफ, ‘मर्डर ऑफ ए कैट’ (2014) में डॉ. मूंधड़ा आदि के बाद ‘अवतार’ 2 और 3 में भी वह डॉ. मैक्स पटेल के किरदार के साथ ही वापसी कर रहे हैं. ऐसे ही लंदन में जन्मे, ब्रिटिश अभिनेता राहुल कोहली (35 वर्षीय) जिनके दादा भारतीय हैं, को डॉ. रवि चक्रवर्ती (टीवी सिरीज आईजॉम्बीः 2015-19) तथा ऑवन शर्मा (दि हॉन्टिंग ऑफ ब्लाय मेनॉर-2020) जैसे किरदारों से पहचान मिली. राहुल का फिल्म-टीवी करियर कोई बहुत लंबा नहीं है, लेकिन उन्होंने अब तक अहमद, वसीम, देव, नवी, आरुण चीना जैसे किरदार निभाए हैं.

ऐसे में याद आती है लियोनार्डो डिकैप्रियो अभिनीत और ऑस्ट्रेलियाई निर्देशक बज लुहर्मन की ‘दि ग्रेट गैट्स्बी’ (2013), जिसमें अमिताभ बच्चन ने मायर फुल्फशम नामक एक रोल निभाया था जो बस कुछ सेकेंड्स का था. इस खबर को लेकर मीडिया में एक सनसनी सी उमड़ पड़ी थी, जबकि बिग बी का कहना था कि उनका रोल पलक झपकने भर तक का है. यानी जितनी देर में पॉपकॉर्न दर्शक के मुंह तक जायेगा, वह स्क्रीन से ओझल हो जाएंगे. हालांकि उनका रोल उतना भी छोटा नहीं था कि किसी का ध्यान ही ना जाये. खासतौर से गेटअप के मामले में.

आम जिंदगी में ऐसे किरदारों की झलक आसानी से नहीं मिलती. एक और उदाहरण है साल 2003 में आयी सुपरहीरो फिल्म ‘दि लीग ऑफ एक्स्ट्राऑर्डीनरी जेंटलमैन’, जिसमें सर शॉन कॉनरी की मुख्य भूमिका थी और अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने कैप्टन नीरो का रोल किया था जो एक काल्पनिक किरदार था. कुछेक बातों को छोड़कर यह एक ऐसा किरदार था, जिसकी रचना कुछ अलग ढंग से की गयी थी. हॉलीवुड फिल्मकारों को कैप्टन नीरो और मायर फुल्फशम जैसे किरदार और गढ़ने चाहिये.

इसी तरह से देखें तो टीवी सिरीज ‘दि गुड डॉक्टर’ में भारतीयों के बड़े रोल के बजाए कई छोटे-छोटे किरदार देखने को मिलते हैं, जो जिससे पता चलता है कि चिकित्सा के क्षेत्र में भारत का दबदबा यूं ही नहीं है और निश्चित रूप से इसका श्रेय सिरीज की लेखक और सह-निर्माता सिमरन बैदवान को भी जाता है. सांभा के नाम से प्रसिद्ध अभिनेता मैक मोहन की बेटी मंजरी मकिजानी जो लॉस एंजेलिस में रहती हैं, ने एक फिल्मकार के रूप में अपनी पहली फिल्म भारतीय पृष्ठभूमि पर बनाई है. स्केटर गर्ल (2021) नामक यह फिल्म राजस्थान में एक ग्रामीण बच्ची की कहानी कहती है, जो स्केटबोर्ड के जरिये अपने सपने सच करना चाहती है.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)

window.addEventListener(‘load’, (event) => {
setTimeout(() => {
nwGTMScript();
nwPWAScript();
fb_pixel_code();
}, 1000);
});
function nwGTMScript() {
(function(w,d,s,l,i){w[l]=w[l]||[];w[l].push({‘gtm.start’:
new Date().getTime(),event:’gtm.js’});var f=d.getElementsByTagName(s)[0],
j=d.createElement(s),dl=l!=’dataLayer’?’&l=”+l:”‘;j.async=true;j.src=”https://www.googletagmanager.com/gtm.js?id=”+i+dl;f.parentNode.insertBefore(j,f);
})(window,document,’script’,’dataLayer’,’GTM-PBM75F9′);
}

function nwPWAScript(){
var PWT = {};
var googletag = googletag || {};
googletag.cmd = googletag.cmd || [];
var gptRan = false;
PWT.jsLoaded = function() {
loadGpt();
};
(function() {
var purl = window.location.href;
var url=”//ads.pubmatic.com/AdServer/js/pwt/113941/2060″;
var profileVersionId = ”;
if (purl.indexOf(‘pwtv=’) > 0) {
var regexp = /pwtv=(.*?)(&|$)/g;
var matches = regexp.exec(purl);
if (matches.length >= 2 && matches[1].length > 0) {
profileVersionId = “https://hindi.news18.com/” + matches[1];
}
}
var wtads = document.createElement(‘script’);
wtads.async = true;
wtads.type=”text/javascript”;
wtads.src = url + profileVersionId + ‘/pwt.js’;
var node = document.getElementsByTagName(‘script’)[0];
node.parentNode.insertBefore(wtads, node);
})();
var loadGpt = function() {
// Check the gptRan flag
if (!gptRan) {
gptRan = true;
var gads = document.createElement(‘script’);
var useSSL = ‘https:’ == document.location.protocol;
gads.src = (useSSL ? ‘https:’ : ‘http:’) + ‘//www.googletagservices.com/tag/js/gpt.js’;
var node = document.getElementsByTagName(‘script’)[0];
node.parentNode.insertBefore(gads, node);
}
}
// Failsafe to call gpt
setTimeout(loadGpt, 500);
}

// this function will act as a lock and will call the GPT API
function initAdserver(forced) {
if((forced === true && window.initAdserverFlag !== true) || (PWT.a9_BidsReceived && PWT.ow_BidsReceived)){
window.initAdserverFlag = true;
PWT.a9_BidsReceived = PWT.ow_BidsReceived = false;
googletag.pubads().refresh();
}
}

function fb_pixel_code() {
(function(f, b, e, v, n, t, s) {
if (f.fbq) return;
n = f.fbq = function() {
n.callMethod ?
n.callMethod.apply(n, arguments) : n.queue.push(arguments)
};
if (!f._fbq) f._fbq = n;
n.push = n;
n.loaded = !0;
n.version = ‘2.0’;
n.queue = [];
t = b.createElement(e);
t.async = !0;
t.src = v;
s = b.getElementsByTagName(e)[0];
s.parentNode.insertBefore(t, s)
})(window, document, ‘script’, ‘https://connect.facebook.net/en_US/fbevents.js’);
fbq(‘init’, ‘482038382136514’);
fbq(‘track’, ‘PageView’);
}



Source link

Leave a Response